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Tuesday, January 7, 2014

भारतीय प्रजातंत्र और हमारा संविधान - डा॰ भरत झुनझुनवाला

हमारे संविधान को संविधान सभा द्वारा बनाया गया है। इस सभा के सदस्यों को राज्य की सभाओं द्वारा भेजा गया था। इन राज्य सभाओं का गठन ब्रिटिश सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया गया था। इस चुनाव में विशेष लोग ही मतदाता थे। जो लोग टैक्स देते थे, शिक्षित थे अथवा प्रापर्टी के मालिक थे, मात्र उनके द्वारा ही वोट दिया गया था। इस प्रकार आम आदमी की सहभागिता संविधान को बनाने में नहीं थी। कहा जा सकता है कि हमारा संविधान ब्रिटिश सरकार द्वारा चिन्हित सम्भ्रान्त वर्गों की देन मात्र है।
संविधान बनाने की हमारी प्रक्रिया की खामियां अमेरिकी प्रक्रिया से तुलना करने से स्पष्ट हो जाती हंै। अमेरिका में संविधान की रूपरेखा एक विशेष सभा द्वारा बनाई गई है। इसके बाद सभी राज्यों में चुनाव कराकर राज्य स्तरीय अनुमोदन सभाएं गठित की गईं। इन अनुमोदन सभाओं द्वारा अनुमोदन किए जाने केे बाद ही  संविधान लागू किया गया। उस संविधान का अनुमोदन आम जनता ने किया था। भारत में ऐसा नहीं हुआ। आम आदमी से कभी नहीं पूछा गया कि वह इस संविधान को स्वीकार करता है या नहीं। कहा जा सकता है कि देश का सम्भ्रान्त वर्ग फला-फूला है जबकि आम आदमी की दशा में मामूली सुधार ही आया है। देश में असमानता में भारी वृद्धि हुई है।
एक और समस्या है। संविधान सभा द्वारा 1949 में संविधान को स्वीकृति दी गई थी। अतः अधिक से अधिक कहा जा सकता है कि 1949 की जनता ने उस संविधान को स्वीकार किया था, किन्तु संविधान सभा के सदस्यों को यह अधिकार किसने दिया कि भविष्य की पीढि़यों पर इसे थोप दें। जिस प्रकार बंधुआ मजदूर को अपनी संतान को बंधुआ बनाने का अधिकार नहीं होता है अथवा किसी परिवार को अपने बच्चे पर ऋण चढ़ाने का अधिकार नहीं होता है, उसी प्रकार संविधान सभा के सदस्यों को भावी पीढि़यों के अधिकारों को हड़पते हुए उनके लिए संविधान बनाने का अधिकार नहीं था। मेरा मानना है कि देश की वर्तमान जनता ने संविधान को स्वीकार नहीं किया है और उनके लिए इसकी नैतिक परिधि में रहने का कोई कारण नहीं है। यही बात केजरीवाल के समर्थक कह रहे हैं, लेकिन देश की अधिकतर जनता ने पिछले 64 वर्षों में संविधान को मौन सहमति दी है। सही है कि समय-समय पर कुछ लोगों ने संविधान व्यवस्था को चुनौती दी है।
तेलंगाना आंदोलन, आपातकाल के दौरान आंदोलन और नक्सलवादी आंदोलन ऐसे ही उदाहरण हैं। फिर भी इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि अधिकतर देशवासियों ने संविधान के विरूद्ध उंगली नहीं उठाई है। इसे मौन सहमति माना जा सकता है, परन्तु यह अपर्याप्त है। हार्वड ला रिव्यू में रिचर्ड फेलन लिखते हैं कि यह तर्क कमजोर है। लोग आलस्य अथवा स्वार्थ के कारण मौन रह सकते हैं। लोगों को पूरी बात समझाकर ली गई सहमति ही सच्ची सम्मति होगी। ध्यान दें कि मौन सहमति को मानने का अर्थ होगा कि मौन सहमति नहीं देने का भी जनता को अधिकार है।
संविधान और आम जनता के बीच सम्बन्ध विच्छेद हो चुका है। पिछले सप्ताह हुई दो घटनाओं से यह बात स्पष्ट हो जाएगी। नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा प्राइवेट एयरलाइनों को आदेश दिया गया है कि 2007 के ज्ञापन के अनुसार सांसदों को मुफ्त चाय, काफी आदि सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएं। मैं समझता हूँ कि सांसदों को छोड़ दें तो पूरी जनता इसके विरोध में होगी। इसी प्रकार आंघ्र प्रदेश की विधान सभा ने राज्य के विभाजन के विरूद्ध प्रस्ताव पारित किया है। ऐसे में शेष राज्यों से जनमत लेना जरूरी था, परन्तु केन्द्र सरकार अपनी समझ को आंध्र समेत पूरी देश की जनता पर थोप रही है। इन खामियों के बावजूद वर्तमान संविधान स्वीकार हो जाता, यदि इसमें संशोधन करने की प्रक्रिया न्यायपूर्ण होती। तब जनता द्वारा इसे विवेकानुसार बदल लिया जाता। परन्तु संशोधन की प्रक्रिया भी उन्हीं सांसदों के हाथ में है जो समस्या की जड़ हैं। सांसदों का चयन बाहुबल और धन के आधार पर होता है अतः इस आधार पर भी संविधान मान्य नहीं होता है।
प्रश्न है आगे क्या करें? चाहे-अनचाहे हमारा जन्म इसी संवैधानिक व्यवस्था में हुआ है। 1949 से हटना नामुमकिन है। उपाय यह हो सकता है कि हर वर्ष विपक्ष द्वारा सुझाए गए मुद्दों पर सरकार के लिए जनमत संग्रह के अनुसार संविधान को स्वीकार किया जाए अथवा इसमें संशोधन किया जाए। तब हम सही मायने में संविधान को अपना सकेगें।
(लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)